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राष्ट्रपति ने फिर जताया भरोसा, हरिवंश नारायण सिंह तीसरी बार राज्यसभा पहुंचे
- Reporter 12
- 10 Apr, 2026
हरिवंश नारायण सिंह को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राज्यसभा के लिए मनोनीत किया है। इसके साथ ही उनका तीसरा कार्यकाल शुरू हो गया है और वे फिर उच्च सदन में सक्रिय भूमिका निभाएंगे।
पटना/आलम की खबर:बिहार की राजनीति में अनुभव, संतुलन और स्वीकार्यता की एक मिसाल माने जाने वाले जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता Harivansh Narayan Singh एक बार फिर राज्यसभा के सदस्य के रूप में अपनी नई पारी शुरू करने जा रहे हैं। राष्ट्रपति Droupadi Murmu द्वारा उनके मनोनयन की घोषणा के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि बदलते राजनीतिक परिदृश्य के बीच भी ऐसे नेताओं की आवश्यकता बनी हुई है, जो केवल दलगत सीमाओं में बंधकर नहीं, बल्कि व्यापक दृष्टिकोण के साथ संसदीय परंपराओं को आगे बढ़ा सकें। यह मनोनयन उस समय सामने आया, जब उनका पिछला कार्यकाल समाप्त हो चुका था और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज थी कि इस बार शायद उन्हें दोबारा मौका न मिले, लेकिन घटनाक्रम ने अचानक करवट ली और एक बार फिर हरिवंश उच्च सदन में पहुंच गए।
राज्यसभा में उनकी यह वापसी केवल एक औपचारिक नियुक्ति नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे उनके लंबे अनुभव और संतुलित कार्यशैली की स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है। वर्ष 2014 में पहली बार राज्यसभा पहुंचने के बाद से लेकर अब तक उन्होंने सदन में अपनी सक्रिय उपस्थिति बनाए रखी है और विभिन्न मुद्दों पर गंभीरता से अपनी बात रखी है। दो कार्यकाल पूरे करने के बाद तीसरी बार मनोनयन मिलना इस बात का संकेत है कि उनकी भूमिका आज भी प्रासंगिक और आवश्यक मानी जा रही है।
उपसभापति के रूप में बनी अलग पहचान
राज्यसभा के उपसभापति के रूप में हरिवंश ने जिस प्रकार सदन की कार्यवाही का संचालन किया, उसने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई। वे पहली बार 9 अगस्त 2018 को इस पद पर निर्वाचित हुए थे और उस समय विभिन्न दलों का समर्थन उनके पक्ष में देखने को मिला था। इसके बाद 14 सितंबर 2020 को उन्हें पुनः इस पद की जिम्मेदारी सौंपी गई, जो उनके प्रति विश्वास का प्रमाण था। सदन में कई बार जटिल और तनावपूर्ण परिस्थितियां बनीं, लेकिन हरिवंश ने धैर्य, नियमों के पालन और संतुलित व्यवहार के जरिए कार्यवाही को सुचारु बनाए रखा। यही वजह है कि वे सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष के बीच भी एक स्वीकार्य चेहरा बने रहे।
पत्रकारिता से संसद तक का सफर
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में जन्मे हरिवंश नारायण सिंह का सफर सामान्य पृष्ठभूमि से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र तक पहुंचने की कहानी है। प्रारंभिक शिक्षा गांव में पूरी करने के बाद उन्होंने वाराणसी में उच्च शिक्षा प्राप्त की और इसके बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा। उन्होंने लंबे समय तक सक्रिय पत्रकार के रूप में कार्य किया और एक प्रमुख हिंदी समाचार पत्र के संपादक के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई। पत्रकारिता के दौरान सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों की गहरी समझ ने उन्हें एक गंभीर विचारक के रूप में स्थापित किया, जिसका लाभ उन्हें राजनीति में भी मिला।
पत्रकारिता से राजनीति में उनका आना अचानक नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक विस्तार माना गया। जब वे जनता दल (यूनाइटेड) से जुड़े, तो उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं और बाद में राज्यसभा भेजा गया। इसके बाद से उनका संसदीय जीवन लगातार आगे बढ़ता रहा और अब तीसरी बार मनोनयन के साथ यह सिलसिला जारी है।
नीतीश कुमार से निकटता, लेकिन सभी दलों में स्वीकार्यता
हरिवंश को मुख्यमंत्री Nitish Kumar का विश्वसनीय सहयोगी माना जाता है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत यह रही है कि वे केवल एक दल तक सीमित नहीं रहे। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ-साथ विपक्षी दलों के बीच भी उनकी स्वीकार्यता बनी रही है। यही कारण है कि जब वे उपसभापति पद के लिए उम्मीदवार बने, तो कई दलों ने उनका समर्थन किया।
बदलते राजनीतिक समीकरणों के बावजूद उन्होंने अपनी निष्पक्ष छवि को बनाए रखा, जो आज के दौर में एक बड़ी बात मानी जाती है। यही संतुलन उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाता है और यही उनके मनोनयन का सबसे बड़ा आधार भी माना जा रहा है।
चुनाव में नाम नहीं, फिर भी बना भरोसा
हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव में हरिवंश का नाम उम्मीदवारों की सूची में शामिल नहीं था, जिससे यह संकेत मिला था कि इस बार उन्हें अवसर नहीं दिया जाएगा। आम धारणा यह भी रही है कि एक ही नेता को बार-बार मौका देने से पार्टी के भीतर असंतुलन पैदा हो सकता है। ऐसे में यह लगभग तय माना जा रहा था कि उनका संसदीय सफर अब समाप्त हो सकता है।
लेकिन राष्ट्रपति द्वारा मनोनयन के फैसले ने इन सभी अटकलों को समाप्त कर दिया। यह निर्णय इस बात का स्पष्ट संकेत है कि राजनीति में केवल संख्या और समीकरण ही नहीं, बल्कि अनुभव, संतुलन और विश्वसनीयता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
निष्कर्ष
हरिवंश नारायण सिंह का तीसरी बार राज्यसभा में पहुंचना उनके लंबे और अनुशासित राजनीतिक जीवन की एक बड़ी उपलब्धि है। एक पत्रकार से लेकर संसद के उपसभापति तक का उनका सफर इस बात का प्रमाण है कि गंभीरता, संयम और निरंतरता के बल पर राजनीति में स्थायी पहचान बनाई जा सकती है। आने वाले समय में जब संसद में विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होगी, तब हरिवंश की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो सकती है। उनकी यह नई पारी न केवल उनके व्यक्तिगत सफर का विस्तार है, बल्कि भारतीय संसदीय परंपरा के लिए भी एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।
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